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ब्लॉग्स (2)
बस्ती जब बाज़ार बन गयी,हस्ती भी व्यापार बन गयी।भिन्न,विभिन्न मतो से चुन कर,त्रिशन्कु सरकार बन गयी।लाख टके की बात सुनी थी,सुन्दर नैनो कार बन गयी।अपनी ही लापरवाही तो,आतंक का हथयार बन गयी।लोक-तन्त्र की जय-जय,जय हो,राजनीति घर-बार बन गयी।-मन्सूर अली हाशमी आगे पढ़ें...

भावना-शून्यता!इससे पहले कि भुजा पर मैरी,अध-खुली उसकी कमर सट जाती,तेज़ झटको से उछलती बस में,आँच मर्यादा पे उसके आती!ऐसा होने न दिया,खुद को संभाल लिया,बस उछलती ही रही - वोह संभलती ही रही।मे था संभला ही हुआ…अपनी मर्यादा मे सिमटे-सिमटे ?उसकी मर्यादा बचाने के ... आगे पढ़ें...